मानिकपुर लोक कल्याणकारी शिविर में प्रशासनिक मौजूदगी के बावजूद उठे गंभीर सवाल
डिण्डौरी |
शहपुरा जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम मानिकपुर में आयोजित लोक कल्याणकारी शिविर अब विवादों के घेरे में आ गया है। शिविर के नाम पर न सिर्फ सरकारी नियमों की अनदेखी की गई, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर भी सवाल खड़े करने वाला घटनाक्रम सामने आया है।
सूत्रों के अनुसार, कार्यक्रम में भीड़ दिखाने के उद्देश्य से आसपास के स्कूलों से स्कूली बच्चों को लाकर बैठाया गया। आरोप है कि बच्चों को नियमित पढ़ाई से हटाकर कार्यक्रम स्थल पर लाया गया, ताकि आयोजन को भव्य और सफल बताया जा सके। यह कृत्य सीधे तौर पर शिक्षा व्यवस्था और बाल अधिकारों का उल्लंघन माना जा रहा है।
*कलेक्टर-विधायक की मौजूदगी में हुआ पूरा आयोजन*
हैरानी की बात यह है कि यह पूरा कार्यक्रम स्थानीय विधायक ओमप्रकाश धुर्वे, जिला कलेक्टर सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में आयोजित हुआ। इसके बावजूद बच्चों के इस्तेमाल पर किसी भी जिम्मेदार अधिकारी द्वारा आपत्ति नहीं जताई गई, जिससे प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
*स्थानीय लोगों में नाराजगी, नियमों के उल्लंघन का आरोप*
स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों का कहना है कि सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर मासूम बच्चों को भीड़ जुटाने का साधन बनाना पूरी तरह नियमों के खिलाफ है। इससे बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई और उनकी सुरक्षा व अधिकारों पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
*मंच से पत्रकार पर आपत्तिजनक टिप्पणी*
कार्यक्रम के दौरान एक और विवाद सामने आया, जब विधायक ओमप्रकाश धुर्वे ने भरे मंच से एक पत्रकार पर टिप्पणी करते हुए कहा—
“तैं तो उल्टा ही छापथस” यानी तुम उल्टा ही छापते हो।
*पत्रकार का संयम, सोशल मीडिया पर दिया करारा जवाब*
भरे मंच से की गई इस टिप्पणी पर भी संबंधित पत्रकार ने कार्यक्रम के दौरान कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और पूरी गंभीरता व समझदारी का परिचय दिया। हालांकि बाद में सोशल मीडिया पर पत्रकार ने स्पष्ट किया कि—
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।
पत्रकार का काम शासन-प्रशासन की कमियों और सच्चाई को सामने लाना है, न कि किसी की निजी प्रशंसा करना।
यदि किसी जनप्रतिनिधि को सिर्फ अपने पक्ष में खबरें चाहिए, तो उन्हें पीआर एजेंसी का सहारा लेना चाहिए।
*कार्रवाई या चुप्पी? प्रशासन की परीक्षा*
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासन इस पूरे मामले में क्या संज्ञान लेता है।
क्या बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन और पत्रकार पर की गई टिप्पणी को लेकर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी,
या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
मानिकपुर का यह मामला अब सिर्फ एक शिविर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जिम्मेदारी, जनप्रतिनिधियों की भाषा और मीडिया की स्वतंत्रता की बड़ी कसौटी बनता जा रहा है।
